द भोपाल स्कूल ऑफ़ सोशल साइंसेज, महाविद्यालय में हिंदी समिति, मानविकी विभाग एवं शिक्षा विभाग के संयुक्त तत्वावधान में हिंदी दिवस के अवसर पर "साहित्यांजलि" कार्यक्रम के अंतर्गत "हिंदी के रंग, बोलियों के संग" विषय पर एक भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य हिंदी भाषा की समृद्ध परंपरा के साथ-साथ उससे संबद्ध विभिन्न लोकबोलियों, लोकसंस्कृति और भारतीय सांस्कृतिक विविधता को मंच पर सजीव रूप में प्रस्तुत करना था। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. फादर जॉन पी. जे. ने अपने उद्बोधन में हिंदी भाषा की उपयोगिता एवं महत्ता पर प्रकाश डालते हुए हिंदी के प्राचीन स्वरूप तथा संस्कृत से उसके भाषायी विकास की चर्चा की। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में हिंदी का महत्व निरंतर बढ़ रहा है। यद्यपि देश में अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं, तथापि हिंदी अपने व्यापक स्वरूप, सहज संप्रेषणीयता और विविध भाषायी रूपों को आत्मसात करने की क्षमता के कारण विशिष्ट स्थान रखती है।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पधारे श्री हेमराज कुर्मी (लेखक एवं मुख्य प्रबंधक) ने हिंदी भाषा और उसकी बोलियों के पारस्परिक संबंध को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि हिंदी का वास्तविक स्वरूप उसकी विविध बोलियों और लोकभाषाओं से और अधिक समृद्ध एवं व्यापक बनता है। उनकी गरिमामयी उपस्थिति एवं प्रेरणादायी उद्बोधन ने कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई। इसके पश्चात "हिंदी के रंग, बोलियों के संग" शीर्षक से मनोहारी सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का क्रम आरंभ हुआ। इस यात्रा में हिंदी की विविध बोलियों ने अपने-अपने विशिष्ट रंग और सांस्कृतिक सौंदर्य के साथ मंच पर अपनी पहचान दर्ज कराई। भोजपुरी, ब्रज, राजस्थानी, हरियाणवी, गढ़वाली एवं बुंदेली बोलियों को केंद्र में रखकर विद्यार्थियों ने मनमोहक लोकनृत्यों एवं सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से भारत की लोकसंस्कृति की विविध छवियों को साकार किया। प्रत्येक बोली की विशिष्ट भाषा-शैली, लोकधुन, वेशभूषा और सांस्कृतिक पहचान को विद्यार्थियों ने अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। भोजपुरी की सहजता, ब्रज की मधुरता, राजस्थानी की रंगीली संस्कृति, हरियाणवी की जीवंतता, गढ़वाली की पहाड़ी संवेदना तथा बुंदेली की माटी से जुड़ी आत्मीयता ने कार्यक्रम को विविध रंगों से भर दिया। लोकनृत्यों ने इन बोलियों को केवल शब्दों तक सीमित न रखते हुए उनकी संस्कृति और जीवन-पद्धति को भी मंच पर सजीव कर दिया। कार्यक्रम के दौरान उपप्राचार्य सिस्टर लीमा जैकब ने भी आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे कार्यक्रम भाषा और उसकी विविध बोलियों को भी उचित महत्व प्रदान करते हैं।